Friday, 25 October 2013

न्याय के प्रवर्तक ऋषि गौतम

न्याय के प्रवर्तक ऋषि गौतम


वह शास्त्र जिसमें किसी वस्तु के यथार्थ ज्ञान के लिये विचारों की उचित योजना का निरुपण होता है,न्यायशास्त्र कहलाता है | वर्तमान समय में विश्व में उपस्थित कानून प्रणाली प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इसी शास्त्र पर आधारित है । वैदिक ऋषि गौतम (व्यक्तिगत नाम 'अक्षपाद') ने भगवान शिव के आदेश पर इस शास्त्र की रचना की ताकि आने वाले समय में जब प्रत्येक व्यक्ति सत्य की अलग अलग प्रकार से व्याख्या करेंगे तब सत्य तक पहुँचने हेतु यह तार्किक प्रणाली उपयोगी सिद्ध होगी । इसका वर्णन शिव महापुराण  में मिलता है | 

महर्षि गौतम परम तपस्वी एवं संयमी थे। महाराज वृद्धाश्व की पुत्री अहिल्या इनकी पत्नी थी, जो महर्षि के शाप से पाषाण बन गयी थी। त्रेता युग में भगवान श्री राम की चरण-रज से अहिल्या का शापमोचन हुआ, जिससे वह पुन: पाषाण से पुन: ऋषि पत्नी बनी ।
 गौतम ऋषि के न्याय दर्शन में सोलह तथ्यों का उल्लेख प्राप्त होता है 

प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः

जिसमें प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धात, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह स्थान हैं. न्याय चार तरह के प्रमाणों की चर्चा करता है-: अनुभूति (प्रत्यक्ष), अर्थ निकालना (अनुमान), तुलना करना (उपमान) और शब्द (साक्य)। 
 अप्रामाणिक ज्ञान में स्मृति, शंका, भूल और काल्पनिक वाद-विवाद शामिल हैं। 
न्यायदर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये चार प्रमाण (Prof) माने गए हैं।
 प्रत्यक्ष का अर्थ है इंद्रियों के साथ सीधा संपर्क होना, अर्थात स्वयं सुनना, देखना, चखना आदि।
 निष्कर्ष तक पहुंचने का जो साधन हो, उसे अनुमान कहते हैं।
 एक वस्तु से दूसरे वस्तु की तुलना कर उसका ज्ञान होना उपमान कहलाता है।
 यथार्थ वाक्य या विद्वानों की कही हुई बातें शब्द प्रमाण कहलाती हैं।

 प्रमाण के द्वारा हम अपने अनुभव के सही या गलत होने का विश्लेषण कर सकते हैं। दर्शन केवल बडे दार्शनिकों के बीच संवाद न होकर संपूर्ण समाज के सोचने-समझने का तरीका है। वाद का अर्थ है-ज्ञान प्राप्ति के लिए की जाने वाली बहस। जिस बहस में जीतना ही उद्देश्य हो, उसे विवाद कहते हैं। यदि हार की संभावना के कारण बहस का उद्देश्य भटक जाए, तो उसे वितंडा कहा जाता है। हेत्वाभास का अर्थ है किसी कारण का दिया जाना, जो कारण लगता है, लेकिन यथार्थ में वह कारण नहीं है। शब्द की विभिन्न वृत्तियों को उलट कर यदि उसके द्वारा किसी बात का विरोध किया जाए, तो वह छल कहा जाता है।
 इस तरह, न्याय तर्क के द्वारा सत्य तक पहुंचने का मार्ग है।

 प्रत्यक्ष प्रमाण इन्द्रियों का विषय के साथ संबंध होने पर जो ज्ञान मिलता है, जो शब्दात्मक नहीं होता अर्थात जिसमे बात की कोई आवश्यकता नही क्योकि जो आँखों द्वारा प्रत्यक्ष देखा गया हो वह सर्व श्रेष्ठ है |
 तथा जो बाद में खंडित या बाधित न होने वाला निश्चयात्मक ज्ञान होता है, वही प्रत्यक्ष है। 


अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष के बाद गौतम ने अनुमान का वर्णन किया है। गौतम के अनुसार अनुमान तीन प्रकार का है- पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट। 
इसके अंतर्गत भूतकाल तथा वर्तमान काल की परिस्थितियों के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाया जाता है   जैसे :
कि वर्तमान में आसमान में बादल घिरे हुए देखकर हम अनुमान लगाते हैं कि अब बारिश होगी। और अनुमान विधि के द्वारा यह बात कदाचित ठीक ही बेठती है  |
धुएं को देख कर ये अनुमान लगाना की यहाँ निश्चय ही आग लगी होगी आदि |
 जिसमें वर्तमान वस्तु स्थिति का ही एकदेश देखकर उसके अवशिष्ट देश के सम्बन्ध में अनुमान किया जाता है, वह शेषवत् अनुमान है। जैसे कि समुद्र की एक बूँद चखकर समुद्र का सारा पानी खारा है, ऐसा अनुमान। जिस अनुमान में दिये जाने वाले प्रत्यक्ष दृष्ट उदाहरण साध्य के साक्षात् उदाहरण नहीं है, साध्य की जाति के नहीं हैं, बल्कि साध्य के सदृश हैं, वह अनुमान सामान्य यानी सादृश्य पर आधारित होने के कारण सामान्यतोदृष्ट कहलाता है, बल्कि साध्य का दर्शन सादृश्य के माध्यम से ही हो सकता है। जैसे कि चंद्र की गति हम प्रत्यक्षत: नहीं देख सकते, लेकिन चंद्र अपना स्थान बदलता है, इतना हम देख सकते हैं। इस स्थानान्तरण से हम अनुमान लगाते हैं कि चंद्र ज़रूर गतिमान है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें कभी नहीं होता है, बल्कि दूसरे क्रियासाधकों के साथ सादृश्य जानकर ज्ञान साधन के रूप में हम सिर्फ़ उनका अनुमान ही कर सकते हैं।


 उपमान प्रमाण तीसरा उपमान प्रमाण है। उपमान किसी अप्रसिद्ध वस्तु की ऐसी जानकारी है, जो प्रसिद्ध वस्तु के साथ उसका साधर्म्य जानकर होती है। जैसे हमें अगर गवय नामक प्राणी की जानकारी न हो और हमें किसी सत्य वक्ता ने बताया हो कि गवय बैल होता है, तो उसके बताए हुए सादृश्य के आधार पर हम गवय को पहचान सकते हैं। 

प्रमाण का चोथा प्रकार शब्द (बात /वार्ता ) है, जो आप्त (यथार्थवक्ता) का वचन है। शब्द प्रमाण आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, (पंच ज्ञानेन्द्रिय), अर्थ (रूपरसगन्धस्पर्शशब्द) बुद्धि (ज्ञान), मनस, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव (मरणोत्तर अस्तित्व) फल, दु:ख और अपवर्ग (मोक्ष) यह बारह प्रमेय हैं। इनके स्वरूप का ज्ञान अपवर्ग के लिए उपयोगी है। गौतम मानते हैं कि अपवर्ग के लिए सर्वप्रथम मिथ्या ज्ञान का नाश होना चाहिए। उसी से काम, क्रोधादि दोषों का नाश हो सकता है। उससे कर्म के प्रति प्रवृत्ति का नाश होगा तथा प्रवृत्ति नाश से हीपुनर्जन्म श्रृंखला खंडित होगी। पुनर्जन्म श्रृंखला खंडित होने से ही दु:ख का नाश होगा और दु:ख नाश ही अपवर्ग का स्वरूप है। 

उपरोक्त वर्णन केवल प्रमाण के चार प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन  है इसके अतिरिक्त श्री गौतम ने  प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धात, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह आदि पर भी पूर्ण वर्णन समाज कल्याण हेतु न्यायशास्त्र के रूप में दिया |

अधिक जानकारी के लिए देखें :
http://hi.wikipedia.org/wiki/न्याय_दर्शन
http://bharatdiscovery.org/india/न्याय_दर्शन

महान रसायनशास्त्री व धातुकर्मी: नागार्जुन

महान रसायनशास्त्री व धातुकर्मी: नागार्जुन


प्राचीन भारत में नागार्जुन नाम के महान रसायन शास्त्री हुए हैं। इनकी जन्म तिथि एवं जन्मस्थान के विषय में अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार इनका जन्म 2 शताब्दी में हुआ था तथा अन्य मतानुसार नागार्जुन का जन्म सन् ९३१ में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था|
नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें 'रस रत्नाकर' और 'रसेन्द्र मंगल' बहुत प्रसिद्ध हैं।
रसायनशास्त्री व धातुकर्मी होने के साथ साथ इन्होंने अपनी चिकित्सकीय ‍सूझबूझ से अनेक असाध्य रोगों की औषधियाँ तैयार की। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें 'कक्षपुटतंत्र', 'आरोग्य मंजरी', 'योग सार' और 'योगाष्टक' हैं।
अपनी पुस्तक रसरत्नाकर में इन्होने रसायन का अथाह ज्ञान पिरो दिया  |
नागार्जुन के रस रत्नाकर में अयस्क सिनाबार से पारद को प्राप्त करने की आसवन (डिस्टीलेशन) विधि, रजत के धातुकर्म का वर्णन  तथा वनस्पतियों से कई प्रकार के अम्ल और क्षार की प्राप्ति की भी विधियां वर्णित हैं। 
इसके अतिरिक्त  रसरत्नाकर में रस (पारे के योगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं। इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं।
पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस थे।
पुस्तक में विस्तारपूर्ण दिया गया है कि अन्य धातुएं सोने में कैसे बदल सकती हैं। यदि सोना न भी बने रसागम विशमन द्वारा ऐसी धातुएं बनाई जा सकती हैं जिनकी पीली चमक सोने जैसी ही होती थी। हिंगुल और टिन जैसे केलमाइन से पारे जैसी वस्तु बनाने का तरीका दिया गया है। 
अधिक जानकारी के लिए देखे: 
https://sites.google.com/site/ekatmatastotra/stotra/scientists/nagarjuna

महर्षि भारद्वाज रचित ‘विमान शास्त्र‘

महर्षि भारद्वाज रचित ‘विमान शास्त्र‘


जन सामान्य में हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के बारे में ऐसी धारणा जड़ जमाकर बैठी हुई है कि वे जंगलों में रहते थे, जटाजूटधारी थे, भगवा वस्त्र पहनते थे, झोपड़ियों में रहते हुए दिन-रात ब्रह्म-चिन्तन में निमग्न रहते थे, सांसारिकता से उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहता था।
इसी पंगु अवधारणा का एक बहुत बड़ा अनर्थकारी पहलू यह है कि हम अपने महान पूर्वजों के जीवन के उस पक्ष को एकदम भुला बैठे, जो उनके महान् वैज्ञानिक होने को न केवल उजागर करता है वरन् सप्रमाण पुष्ट भी करता है। महर्षि भरद्वाज हमारे उन प्राचीन विज्ञानवेत्ताओं में से ही एक ऐसे महान् वैज्ञानिक थे जिनका जीवन तो अति साधारण था लेकिन उनके पास लोकोपकारक विज्ञान की महान दृष्टि थी।
महर्षि भारद्वाज और कोई नही बल्कि वही  ऋषि है जिन्हें त्रेता युग में  भगवान श्री राम से मिलने का सोभाग्य दो बार प्राप्त हुआ । एक बार श्री राम के  वनवास काल में तथा दूसरी बार श्रीलंका से लौट कर अयोध्या जाते समय। इसका वर्णन वाल्मिकी रामायण तथा तुलसीदास कृत रामचरितमानस में मिलता है |
 तीर्थराज प्रयाग में संगम से थोड़ी दूरी पर इनका आश्रम था, जो आज भी विद्यमान है। महर्षि भरद्वाज की दो पुत्रियाँ थीं, जिनमें से एक (सम्भवत: मैत्रेयी) महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्याही थीं और दूसरी इडविडा (इलविला) विश्रवा मुनि को |
महाभारत काल तथा उससे पूर्व भारतवर्ष में भी विमान विद्या का विकास हुआ था । न केवल विमान अपितु अंतरिक्ष में स्थित नगर रचना भी हुई थी | इसके अनेक संदर्भ प्राचीन वांग्मय में मिलते हैं । 
निश्चित रूप से उस समय ऐसी विद्या अस्तित्व में थी जिसके द्वारा भारहीनता (zero gravity) की स्थति उत्पन्न की जा सकती थी । यदि पृथ्वी की गरूत्वाकर्षण शक्ति का उसी मात्रा में विपरीत दिशा में प्रयोग किया जाये तो भारहीनता उत्पन्न कर पाना संभव है |

विद्या वाचस्पति पं. मधुसूदन सरस्वती " इन्द्रविजय " नामक ग्रंथ में ऋग्वेद के छत्तीसवें सूक्त प्रथम मंत्र का अर्थ लिखते हुए कहते हैं कि ऋभुओं ने तीन पहियों वाला ऐसा रथ बनाया था जो अंतरिक्ष में उड़ सकता था । पुराणों में विभिन्न देवी देवता , यक्ष , विद्याधर आदि विमानों द्वारा यात्रा करते हैं इस प्रकार के उल्लेख आते हैं । त्रिपुरासुर याने तीन असुर भाइयों ने अंतरिक्ष में तीन अजेय नगरों का निर्माण किया था , जो पृथ्वी, जल, व आकाश में आ जा सकते थे और भगवान शिव ने जिन्हें नष्ट किया ।

 वेदों मे विमान संबंधी उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलते हैं। ऋषि देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेखऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है। ऋषिओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उडऩे वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी पाया जाता है। महाभारत में श्री कृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है ।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान’ (जो लंकापति रावण के पास था) के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं। लेकिन इन सबको कपोल-कल्पित माना जाता रहा है। लगभग छह दशक पूर्व सुविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डॉ0 वामनराव काटेकर ने अपने एक शोध-प्रबंध में पुष्पक विमान को अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित बतलाया था, जिसका आधार `अगस्त्य संहिता´ की एक प्राचीन पाण्डुलिपि थी। अगस्त्य के `अग्नियान´ ग्रंथ के भी सन्दर्भ अन्यत्र भी मिले हैं। इनमें विमान में प्रयुक्तविद्युत्-ऊर्जा के लिए `मित्रावरुण तेज´ का उल्लेख है। महर्षि भरद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत् ज्ञान को अभिवर्द्धित किया। 
 महर्षि भारद्वाज ने " यंत्र सर्वस्व " नामक ग्रंथ लिखा था, जिसमे सभी प्रकार के यंत्रों के बनाने तथा उन के संचालन का विस्तृत वर्णन किया। उसका एक भागवैमानिक शास्त्र है |
इस ग्रंथ के पहले प्रकरण में प्राचीन विज्ञान विषय के पच्चीस ग्रंथों की एक सूची है, जिनमें प्रमुख है अगस्त्यकृत - शक्तिसूत्र, ईश्वरकृत - सौदामिनी कला, भरद्वाजकृत - अशुबोधिनी, यंत्रसर्वसव तथा आकाश शास्त्र, शाकटायन कृत - वायुतत्त्व प्रकरण, नारदकृत - वैश्वानरतंत्र, धूम प्रकरण आदि ।
 विमान शास्त्र की टीका लिखने वाले बोधानन्द लिखते है -
 निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः । 
 नवनीतं समुद्घृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम्‌ ।
 प्रायच्छत्‌ सर्वलोकानामीप्सिताज्ञर्थ लप्रदम्‌ ।
 तस्मिन चत्वरिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम्‌ ॥ 
 नाविमानर्वैचित्र्‌यरचनाक्रमबोधकम्‌ । 
 अष्टाध्यायैर्विभजितं शताधिकरणैर्युतम । 
 सूत्रैः पञ्‌चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम्‌ । 
 वैमानिकाधिकरणमुक्तं भगवतास्वयम्‌ ॥ 
अर्थात - भरद्वाज महामुनि ने वेदरूपी समुद्र का मन्थन करके यन्त्र सर्वस्व नाम का ऐसा मक्खन निकाला है , जो मनुष्य मात्र के लिए इच्छित फल देने वाला है । उसके चालीसवें अधिकरण में वैमानिक प्रकरण जिसमें विमान विषयक रचना के क्रम कहे गए हैं । यह ग्रंथ आठ अध्याय में विभाजित है तथा उसमें एक सौ अधिकरण तथा पाँच सौ सूत्र हैं तथा उसमें विमान का विषय ही प्रधान है । ग्रंथ के बारे में बताने के बादबोधानन्द भरद्वाज मुनि के पूर्व हुए आचार्य व उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं |  वे आचार्य तथा उनके ग्रंथ निम्नानुसार हैं ।
( १ ) नारायण कृत - विमान चन्द्रिका ( २ ) शौनक कृत न् व्योमयान तंत्र ( ३ ) गर्ग - यन्त्रकल्प ( ४ ) वायस्पतिकृत - यान बिन्दु + चाक्रायणीकृत खेटयान प्रदीपिका ( ६ ) धुण्डीनाथ - व्योमयानार्क प्रकाश 
  
विमान की परिभाषा देते हुए अष् नारायण ऋषि कहते हैं जो पृथ्वी, जल तथा आकाश में पक्षियों के समान वेग पूर्वक चल सके, उसका नाम विमान है ।

शौनक के अनुसार- एक स्थान से दूसरे स्थान को आकाश मार्ग से जा सके ,
विश्वम्भर के अनुसार - एक देश से दूसरे देश या एक ग्रह से दूसरे ग्रह जा सके, उसे विमान कहते हैं ।  
अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत शोध मण्डल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किये। फलस्वरूप् जो ग्रन्थ मिले, उनके आधार पर भरद्वाज का `विमान-प्रकरण´, विमान शास्त्र प्रकाश में आया। इस ग्रन्थ का बारीकी से अध्यन करने पर आठ प्रकार के विमानों का पता चला : 
1. शक्त्युद्गम - बिजली से चलने वाला। 
2. भूतवाह - अग्नि, जल और वायु से चलने वाला। 
3. धूमयान - गैस से चलने वाला। 
4. शिखोद्गम - तेल से चलने वाला। 
5. अंशुवाह - सूर्यरश्मियों से चलने वाला। 
6. तारामुख - चुम्बक से चलने वाला। 
7. मणिवाह - चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला। 
8. मरुत्सखा - केवल वायु से चलने वाला। 

 इसी ग्रन्थ के आधार पर भारत के बम्बई निवासी शिवकर जी ने Wright brothers से 8 वर्ष पूर्व ही एक विमान का निर्माण कर लिया था ।
सर्वप्रथम इस विमान शास्त्र को मिथ्या माना  गया परन्तु अध्यन से चोंका देने वाले तथ्य सामने आये जैसे विमान का जो प्रारूप तथा जिन धातुओं  से  विमान का निर्माण इस विमान शास्त्र में उल्लेखित है  वह परिकल्पना आधुनिक विमान निर्माण पद्धति से मेल  खाती है

एक और विडियो देखें यह है तो तेलुगु भाषा में परन्तु यदि आप न भी समझ पाए फिर भी  आप विडियो तो देख ही सकते है :

अधिक जानकारी के लिए देखे:
http://www.thelivingmoon.com/47brotherthebig/03files/Vimanas_Mercury_Vortex_Technology.html 
https://sites.google.com/site/ekatmatastotra/stotra/scientists/bhardwaja
http://www.bibliotecapleyades.net/vimanas/vimanas.htm#menu
http://www.hindusthangaurav.com/viman.asp
http://www.hindi.kalkion.com/article/546
http://www.savehinduism.in/stories/article/925.html
http://www.hindi.kalkion.com/article/546
गूगल किताब 

Sunday, 13 October 2013

भारत रत्न भाई श्री राजीव दीक्षित जी को शत शत नमन !!! अब श्री राजीव दिक्षित जी की दस (10) पुस्तकें PDF रूप में उपलब्ध है, विशेष बात यह है की लगभग सभी पुस्तकों का नवीन संस्करण है और PDF फाइल की साइज़ बहुत ही कम है । इनमें मुख्य पुस्तकें जो आपके लिए बहुत लाभदायक है इन्हे डाउनलोड करे और अपने मित्रो रिश्तेदारो तक भी पहुचाएं

भारत रत्न भाई श्री राजीव दीक्षित जी को शत शत नमन !!!

अब श्री राजीव दिक्षित जी की दस (10) पुस्तकें PDF रूप में उपलब्ध है, विशेष बात यह है की लगभग सभी पुस्तकों का नवीन संस्करण है और PDF फाइल की साइज़ बहुत ही कम है ।
इनमें मुख्य पुस्तकें जो आपके लिए बहुत लाभदायक है इन्हे डाउनलोड करे और अपने मित्रो रिश्तेदारो तक भी पहुचाएं

*स्वदेशी चिकित्सा - भाग 1 ( दिनचर्या - ऋतुचर्या के आधार पर )
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SwadeshiChikitsa-1.pdf

*स्वदेशी चिकित्सा - भाग 2 ( बिमारियों को ठीक करने के आयुर्वेदिक नुस्ख़े )
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SwadeshiChikitsa-2.pdf

* स्वदेशी चिकित्सा - भाग 3 ( बिमारियों को ठीक करने के आयुर्वेदिक नुस्ख़े )
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SwadeshiChikitsa-3.pdf

* स्वदेशी चिकित्सा - भाग 4 ( गंभीर रोगों की घरेलु चिकित्सा )
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SwadeshiChikitsa-4.pdf

* गौमाता पंचगव्य चिकित्सा
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/GaumataPanchagavyaChikitsa.pdf

* गौ-गौवंश पर आधारित स्वदेशी कृषि
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/Gau-GauVanshParAdharitSwadeshiKrushi.pdf

* गुलामी और लूट का दस्तावेज - WTO
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/GulamiAurLootKaDastavej-WTO.pdf

* आपका स्वास्थ्य आपके हाथ
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/AapkaSwasthyaAapkeKeHaath.pdf

* स्वावलंबी और अहिंसक उपचार
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SwalambiAurAhinsakUpchar.pdf

* सच्चे स्वराज्य की रुपरेखा
लिंक:: http://archive.org/download/RajivDixitBooks/SaccheSwarajKiRooprekha.pdf और
राजीव भाई के सभी ऑडियो व्याख्यान के downloed linkes जिसे ये पसंद आए कृपया वो इसे फैलाए भारत को चाहिये कुछ और राजीव दीक्षित !!!
http://98.130.113.92/Bharat_Ke_Samajik_Evam_Charitrik_Patan_Ka_Shadyantra.mp3
http://98.130.113.92/Sangathan_Ki_Maryada_Evam_Siddhant.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Ka_Swarnim_Atit.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Ki_Vishwa_Ko_Den.mp3
http://98.130.113.92/Aetihaasik_Bhoolen.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Mein_Gulaami_Ki_Nishaaniyan.mp3
http://98.130.113.92/Videshi_Kampaniyon_Ki_Loot_Evam_Swadeshi_Ka_Darshan.mp3
http://98.130.113.92/Mansaahaar_Se_Haaniyan.mp3
http://98.130.113.92/Swadeshi_Se_Swawlambi_Bharat.mp3
http://98.130.113.92/Angrejee_Bhasha_Ki_Gulaami.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Ka_Sanskrutik_Patan.mp3
http://98.130.113.92/Vish_Mukt_Kheti.mp3
http://98.130.113.92/Sanskrut_Bhasha_Ki_Vaigyanikta.mp3
http://98.130.113.92/Vyavastha_Parivartan_Ki_Kranti.mp3
http://98.130.113.92/Antarraashtriya_Sandhiyon_Mein_Phansa_Bharat.mp3
http://98.130.113.92/Maut_Ka_Vyapar.mp3
http://98.130.113.92/Swaasthya_Katha.mp3
http://98.130.113.92/Kheti_Aur_Kisaano_Ki_Gulaami.mp3
http://98.130.113.92/Swiss_Banks_Mein_Bharat_Ki_Loot.mp3
http://98.130.113.92/Bharatiya_Azaadi_Ka_Itihaas.mp3
http://98.130.113.92/Videshi_Vigyapano_Ka_Jhoot.mp3
http://98.130.113.92/Elizabeth_Ki_Bharat_Yaatra_1997.mp3
http://98.130.113.92/Macaulay_Shikshan_Paddhati.mp3
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http://98.130.113.92/Mahatma_Gandhi_Ko_Shradhanjali.mp3
http://98.130.113.92/Patent_Kaanoon_Aur_Davao_Par_Hamla.mp3
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http://98.130.113.92/Pokhran_Parikshan_Aur_Arthik_Dighbandhan.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Aur_Europe_Ki_Sanskruti.mp3
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http://98.130.113.92/CTBT_Aur_Bharatiya_Asmita.mp3
http://98.130.113.92/Arthvyavastha_Ko_Sudhaarne_Ke_Upaay.mp3
http://98.130.113.92/Arthvyavastha_Ko_Sudhaarne_Ke_Upaay.mp3
http://98.130.113.92/Pratibha_Palaayan_Pune_Engg_College.mp3
http://98.130.113.92/Swadeshi_Andolan_Mein_Ganesh_Utsav_Ka_Mahatva.mp3
http://98.130.113.92/Bharat_Par_Videshi_Aakraman_Kargil_Yuddh.mp3
http://98.130.113.92/Aatankvaad_Aur_Uska_Nivaaran_WTC_Attack.mp3

— जय हिन्द !!!
— with प्रदीप सोनी विद्रोही and Deepanshu Yadav Abvp.

Thursday, 8 August 2013

राजीव दीक्षित के ऑडियो व्याख्यान डाउनलोड करें

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दवा और डाक्टर के बिना सुखी और स्वस्थ कैसे रहें (How to stay Happy & Healthy without Medicine and Doctor) (download)


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Thursday, 7 February 2013

भारत की श्रेष्ठतम देन है - एकात्म विज्ञान दृष्टि


भारत की श्रेष्ठतम देन है - एकात्म विज्ञान दृष्टि


लेखक - सुरेश सोनी
महर्षि कपिल ने कहा कि सृष्टि पूर्व की जो अवस्था है उसमें जब प्रकृति अव्यक्तावस्था में रहती है, तब सभी गुण साम्यावस्था में रहते हैं। यह साम्यावस्था टूटती है मूल तत्व के संकल्प से, जिसका वर्णन उपनिषदों ने किया- एकोऽहं बहुस्याम - यह संकल्प ही इच्छाशक्ति है। इससे गुणों की साम्यावस्था भंग होती है तथा उस अव्यक्त प्रकृति में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा इसी के साथ सृष्टि व्यक्त होने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। उसका प्रथम विकास महत्‌ अथवा विराट्‌ बुद्धि शक्ति के रूप में होता है, यही ज्ञान शक्ति है। एक मूलभूत ज्ञान शक्ति सूक्ष्म परमाणु से लेकर संपूर्ण व्रह्माण्ड तक का नियमन कर रही है, इसकी पुष्टि निम्न तथ्यों से प्रतीत होती है-

(१) विराट्‌ रचनाओं में आकाश गंगा की रचना सर्पिल भुजाओं (च्द्रत्द्धठ्ठथ्‌ द्मन्र्थ्र्थ्र्ड्ढद्यद्धन्र् दृढ ठ्ठ ढ़ठ्ठथ्ठ्ठन्न्र्‌) जैसी है। दूसरी ओर सूक्ष्मतम गुणवाहक (क्रड्ढदड्ढ) का भी सर्पिल द्विभुज मॉडल (क़्दृद्वडथ्ड्ढ ण्ड्ढथ्त्न्‌ द्मन्र्द्मद्यड्ढथ्र्‌) है।

(२) ‘क्ष्दढत्दत्द्यड्ढ त्द ठ्ठथ्थ्‌ क़्त्द्धड्ढड़द्यत्दृद‘ नामक अपनी पुस्तक में फ्र्ीमैन डायसन कहते हैं, ‘एक अद्भुत साम्य आकार की दृष्टि दुनिया में दिखाई देती है। इसे चार संदर्भों में देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा। (१)सम्पूर्ण दृश्य विश्व (२) हमारी पृथ्वी (३) परमाणु का केन्द्रक या दद्वड़थ्ड्ढद्वद्म (४) अधिसूत्र या च्द्वद्रड्ढद्ध च्द्यद्धत्दढ़। इसमें हमारी पृथ्वी ज्ञात विश्व से १०२० गुना छोटी है। परमाणु केन्द्रक का आकार पृथ्वी के अनुपात में १०२० गुना छोटा है तथा अधिसूत्र परमाणु केन्द्रक से १०२० गुना छोटा है।‘

सांख्य कहता है, महत्‌ से अहंकार उत्पन्न होता है, जिसके तीन रूप हैं- वैकारी अहंकार तेजस्‌ अहंकार और भूताहि अहंकार। इनसे पंचतन्मात्रा तथा उनसे विभिन्न इन्द्रियां तथा जगत्‌ के विभिन्न पदार्थ बनते हैं। सृष्टिचक्र गतिमान होता है तथा प्रलय काल में पुन: इसी क्रम से उसका लोप हो जाता है। यह विभिन्न शक्तियां, उनसे सृष्टि का चक्र गतिमान होना, फिर लोप होना, यह क्या है, तो वेदान्त कहता है- ‘कम्पनात्‌‘ अर्थात्‌ निर्माण या विध्वंस। सबमें कंपन है, स्पंदन है। भगवान बुद्ध कहते हैं सम्पूर्ण जगत प्रकम्पन है- ‘सब्बोप्रज्जालितो लोको, सब्बो लोको प्रकम्पितो‘। जगत में ठोस जैसा कुछ नहीं है, केवल प्रकम्पन ही है। आदि शंकराचार्य कहते हैं- परमाणु से लेकर व्रह्मलोक तक तथा सामान्य शक्ति से लेकर प्राणशक्ति तक सब स्पन्दन है। स्वामी विवेकानंद भी कहते थे, ‘संपूर्ण जगत कम्पन है, स्पन्दन है। इतना ही है कि मन तीव्र कम्पन है तथा स्थूल या जिसे जड़ कहा जाता है, वह मंद कम्पन है।‘ व्रह्माण्ड का सृजन और लोप कम्पन का ही परिणाम है। कम्पन समुद्र की लहरों के समान है। जैसे समुद्र की सतह के ऊपर हलचल रहती है पर नीचे का आधार शांत रहता है, उसी प्रकार जगत्‌ का मूलाधार व्रह्म है, कम्पन तो ऊपरी सतह पर है।

इस प्रकार व्रह्माण्ड के विवेचन में उन्होंने जाना कि जगत्‌ एवं उस जगत्‌ के द्रष्टा के तीन स्तर हैं। पहला स्थूल जगत है, जिसकी अनुभूति हम जागृत अवस्था में करते हैं। दूसरा सूक्ष्म जगत है, जिसका अनुभव हम स्वप्नावस्था में करते हैं। दोनों जगत्‌ की रचना भिन्न है, जागृत जगत्‌ भौतिक परमाणुओं का समुच्चय है तो स्वप्न जगत भावमय परमाणुओं का। दोनों में काल का मापन भिन्न है, या कह सकते हैं कि सापेक्ष है। एक और तीसरा जगत है जिसे कारण जगत्‌ कहा गया, जिसकी अनुभूति प्रगाढ़ निद्रा में होती है।

इस प्रकार व्रह्माण्ड के विविध रूप, विविध शक्तियां तथा इनका द्रष्टा, इन सबका समन्वय निम्न रूप में किया-

तीन जगत्‌- (१) स्थूल (२) सूक्ष्म (३) कारण
तीन अवस्थाएं- (१) जागृत (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति


तीन शक्तियां- (१) क्रिया (२) ज्ञान (३) इच्छा। ये सभी जिस मूल आधार से उद्भूत हैं, उसे ही व्रह्म कहा गया। इसकी अनुभूति चतुर्थ अवस्था-तुरीय अवस्था में होती है।
विराट समुद्र की गहराई में निश्चल जल रहता है, पर उसके ऊपर छोटी-बड़ी लहरें उठती हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण व्रह्माण्ड व्रह्म समुद्र में लहरों के समान उठते और विलीन होते रहते हैं। इसी को व्रह्म कहा गया, अन्तिम सत्य कहा गया तथा जिसके वर्णन की चेष्टा भिन्न-भिन्न रूपों में भारतीय वांगमय में प्राप्त होती है।

(१) ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह‘
(तै.उ. १२-४-१)
अर्थात्‌-जहां से वाणी मन सहित लौटकर आ जाती है।

(२) यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति
येन यत्‌ प्रयन्त्यभिसंविशंन्ति तद्विजिज्ञासस्व च तद्व्रह्मेति। (तै.उ.३-१-१)

अर्थात्‌- जिससे सभी भूत उत्पन्न होते हैं, जिसमें रहते हैं तथा जिसमें विलीन हो जाते हैं, उसे जानो। वही व्रह्म है।

(३) स यथा उर्णनाभि: तन्तुना उच्यरेत्‌ यथा अग्ने:
क्षुद्रा: विस्फुलिंगा: व्युच्चरन्ति एवम्‌ एव अस्मात्‌
आत्मन: सर्वे प्राणा: सर्वे लोका: सर्वे देवाऽ सर्वांणि
भूतानि व्युच्चरन्ति तस्य उपनिषद्‌ सत्यस्य सत्यं
इति प्राणा: वै सत्यं तेषां एष: सत्यम्‌।

(बृहदारण्यक उपनिषद्‌ २-१-२०)

अर्थात्‌- जिस प्रकार मकड़ी के अंदर से जाल निकलता है, जिस प्रकार अग्नि में से छोटे-छोटे स्फुल्लिंग निकलते हैं, उसी प्रकार इस आत्मा से सभी प्रकार की शक्तियां, सभी प्रकार के लोक, सभी प्रकार के देव तथा सम्पूर्ण स्थूल जगत उत्पन्न होते हैं। उसको जानो, उसके निकट जाओ, वह सत्य का भी सत्य है। मूलभूत ऊर्जा सत्य है, परन्तु वह इसका भी सत्य है।

इस प्रकार भारतीय प्रज्ञा के मत में चेतना के अनंत समुद्र की क्षणिक अभिव्यक्ति ही यह व्रह्मांड है। अनेक पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी इस विषय में सोचा है। २५ जनवरी, १९३१ के ऑब्जर्वर में जे.डब्ल्यू. एन-सुलिवान द्वारा मैक्सप्लांक से लिया गया साक्षात्कार छपा है। इसमें सुलिवान प्रश्न पूछता है कि क्या चेतना की व्याख्या पदार्थ और उसके नियमों के तहत की जा सकती है? उत्तर में मैक्सप्लांक ने कहा ‘मैं ऐसा नहीं सोचता। मेरी दृष्टि में चेतना मौलिक है और पदार्थ उसका परिणाम है। पदार्थ चेतना का विस्तार है।‘

स्वामी विवेकानंद ने इसे अलग तरह से अभिव्यक्त किया। वे कहते हैं ‘ऐसा लगता है कि चेतना का प्रवाह अभ्यंतर से उत्सर्जित होकर भौतिक दुनिया की ओर सतत प्रवाहित हो रहा है।‘

सम्पूर्ण जगत्‌ में निर्जीव व सजीव ऐसा कोई निरपेक्ष विभाजन नहीं हो सकता, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में एकत्व है। इसे जगदीश चन्द्र बसु ने १० मई, १९०१ को रॉयल इन्स्टीट्यूट में प्रयोगों के द्वारा विश्व के वैज्ञानिकों के समक्ष सिद्ध किया। टीन के टुकड़े पर कॉस्टिक पोटाश की विष उत्पन्नकारी खुराक देने पर उसकी विद्युत धड़कन बंद हुई, जैसे सजीव कोशिका में होती है। साथ ही विष हरणवाली सुई लगाने पर धातु में पुन: सामान्य प्रतिक्रिया आने लगी। इस प्रभाव के अनेक प्रदर्शन के बाद सजीव और निर्जीव की थकावट के इतिहास के स्वत: प्राप्त रिकार्डों के प्रमाण प्रस्तुत कर बोस ने अपना भाषण निम्नलिखित शब्दों में समाप्त किया-

‘इस प्रकार के प्राकृतिक तथ्यों में क्या हम भौतिकीय प्रक्रिया और शरीर पर होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया के बीच कोई सीमा रेखा खींच सकते है? ऐसी कोई भी सीमा रेखा नहीं होती।‘

‘जब मैंने अपने आप बने रिकार्डों के मूक साक्ष्य को देखा और कण, जो प्रकाश की लहरों में कंपित होता है, हमारी पृथ्वी का जीवन और प्रकाशवान सूर्य, जो हमारे ऊपर चमक रहा है, उन सभी वस्तुओं में व्याप्त एकता का अवलोकन किया, तभी मैं पहली बार उस संदेश को कुछ-कुछ समझ सका जिसकी घोषणा मेरे पूर्वजों ने गंगा के सुरम्य तटों पर तीन हजार वर्ष पहले की थी, कि इस विश्व के सभी परिवर्तनशील स्वरूपों में एक ही सत्य है, केवल एक-और कुछ नहीं।‘

अन्तिम सत्य जानने का साधन- एक बार अनिश्चितता सिद्धान्त के जनक हीजेनबर्ग ने परमाणु के ग्रहीय मॉडल का प्रतिपादन करने वाले महान विज्ञानी नील्स बोर से पूछा, यदि परमाणु की आन्तरिक बनावट इस प्रकार वर्णनातीत है जैसा आप कह रहे हैं तथा इसे अभिव्यक्त करने के लिए हमारे पास कोई भाषा नहीं है, तो इसे कभी समझ पाने की आशा हम कैसे करें? इस पर कुछ देर चुप रहकर कुछ झिझक के साथ नील्स बोर बोले ‘इस सबके बाद भी हम समझ सकते हैं, पर हमें समझने का अर्थ सीखना पड़ेगा।‘ बोर के इस कथन में गहराई है। यह समझना कैसे होगा। इस सन्दर्भ में आइंस्टीन का एक वाक्य स्मरण आता है।

किसी ने आइंस्टीन से पूछा कि जगत्‌ की अंतिम वास्तिवकता (रियालिटी) को कैसे जानें, तो आइंस्टीन ने कहा, हम जिन उपकरणों (इन्द्रीय तथा बुद्धि आदि) के द्वारा जगत्‌ को जानने का प्रयत्न करते हैं, वह इस जगत्‌ का ही हिस्सा है। वह भी देश (च्द्रठ्ठड़ड्ढ), काल (च्र्त्थ्र्ड्ढ) तथा निमित्त (ड़ठ्ठद्वद्मड्ढद्म द्धड्ढथ्ठ्ठद्यत्दृद) की परिधि में हैं तथा सत्य इस परिधि के परे है। अत: उन्होंने कहा-

‘ख्द्वथ्र्द्र ठ्ठडदृध्ड्ढ न्र्दृद्वद्ध दृध्र्द थ्र्त्दड्ड‘ अर्थात्‌ अपने मन के परे छलांग लगाओ। पर यह छलांग कैसे लगानी है, यह पश्चिम को ज्ञात नहीं। हमारे यहां की योग साधना तथा अन्यान्य साधना पद्धतियों में देश, काल और निमित्त की परिधि के परे कालातीत अवस्था में पहुंचने की विधि का भी प्रतिपादन किया गया है।

श्वेताश्वर उपनिषद्‌ में वर्णन आता है कि जगत क्या है? उसका कारण क्या है? इसके विश्लेषण में किसी ने काल को कारण माना, किसी ने स्वभाव को, किसी ने आकस्मिक संयोग को, किसी ने प्रकृति को, किसी ने भूत समुच्चय को, किसी ने पुरुष को तो किसी ने इस सबके योग को। पर अंतिम सत्य न मिला, तब क्या किया जाए। इसके उत्तर में उपनिषद्‌ कहता है।

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्‌
देवात्मशक्तिं स्वगुणै र्निग्ढ़ाम्‌।
य: कारणानि निखिलानि तानि
कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येक।
 (श्वेताश्वर उपनिषद्‌ १-३)

अर्थात्‌ तब उन्होंने ध्यान योग का आश्रय ले, आन्तरिक गहराइयों में उतरकर उस परम शक्ति का साक्षात्कार किया, जो काल सहित इस सम्पूर्ण जगत्‌ का कारण है। और जब यह साक्षात्कार होता है तब हम अनुभव करते हैं कि सब कुछ ज्ञात-अज्ञात उस एक की ही अभिव्यक्ति है तथा सम्पूर्ण जगत्‌, उसकी शक्तियां, पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, वृक्ष, मानव सब उसी एक तत्व के विभिन्न रूप हैं। इस अनुभूति में से एक एकात्मदृष्टि उत्पन्न होती है। यह एकात्म विज्ञान दृष्टि भारत की श्रेष्ठतम देन है, जो जीव और निर्जीव के भेद को समाप्त कर देती है तथा जगत्‌ और उसके सबसे बड़े रहस्य मानव की सभी समस्याओं का समाधान करती है। इस एकात्म विज्ञान दृष्टि की देन दुनिया को भारत ही दे सकता है